Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 216, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 216 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
एतत्ते कथितं राजन्कुम्भयोनेः सुभाषितम् ।
अमुना तत्त्वमार्गेण तत्पदं प्राप्स्यसि ध्रुवम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : हे मेरे शिष्यो में सर्वश्रेष्ठ, हे महामते भरद्वाज, श्रीरामचन्द्रजी आदि
पूर्वोक्त रीति के अनुसार ज्ञातव्य परम तत्त्व को जानकर शोक रहित हुए
सर्ग सन्दर्भ
दो सौ चौढहवाँ सर्ग समाप्त दो सौ पन्द्रहवाँ सर्ग तुम राम आदि के समान प्रबुद्ध होकर जीवन्मुक्त सुखी होओ यों श्री वाल्मीकिजी का अपने शिष्य भरद्राज को उपदेश देना ।