Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verses 8–9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verses 8–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 8,9
संस्कृत श्लोक
असतः शशश्रृङ्गादेर्मृगतृष्णाम्भसो यथा ।
आलोकनादलभ्यस्य कीदृक् स्यात्किल कारणम् ॥ ८ ॥
असतः शशश्रृङ्गादेः कारणं मार्गयन्ति ये ।
वन्ध्यापुत्रस्य पौत्रस्य स्कन्धमासादयन्ति ते ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
इस समय दिखाई दे रहा भी बीज सद्रूप अंकुर का कारण है या असद्रूप आकर का कारण हैं 2
सद्रूप अंकुर का कारण तो वह हो नहीं सकता, क्योकि सत् को कारण की अपेक्षा ही नहीं रहती,
अद्र का भी कारण नहीं हो सकता, यह कहते हैं।
खरगोश के सींग आदि तथा मृगतृष्णा जल के समान विचार से अलभ्य इस जगत् का कारण
कैसा होगा ? जो पुरुष असत् खरगोश के सींग आदि के कारण की खोज करते हैं, वे वन्ध्यापुत्र के
या उसके पौत्र के कन्धे के ऊपर मानों आरोहण करते हैं