Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 23, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
न स्फुरन्ति विचारेषु प्रज्वलन्त्यनुभूतिषु ।
न त्रस्यन्ति दुराचारादश्मयन्त्रमया इव ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
पत्थर की बनी मूर्तियों
की नाई वे विचारों में स्फ्रित नहीं होते यानी मूढ़ होते हैं, अनुभूतियों में खूब जलते हैं तथा
दुराचार से वे कतई नहीं डरते (५)