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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, Verse 19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 23, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

आभिजात्याततोदारा शीतला रसशालिनी । नेह विश्वसिति प्रक्षा मेघमाला मराविव ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

दोनों कुल की (=) अर्थात्‌ मैंने उसका भाग्योदयकाल जानकर उसके सम्पूर्ण श्रम का मूलोच्छेद करने के लिए आगे कही जानेवाली बातें पूछ दीं । (८) हे अधराघ्वग, इस सम्बोधन से उस समय महाराज वसिष्ठजी का आकाशमार्ग से गमन सूचित होता है । (५) यह ऊपरी अर्थ है । इसका मनोगत अर्थ यह है - हे अधरकर्म के पथिक, कर्मोपासना से लब्ध होनेवाले इस दक्षिणायन -उत्तरायन मार्गरूपी पथमे, स्वर्ग आदि भूमियों में कुछ-कुछ विश्रान्ति को प्राप्त करते हुए भी जन्मसमूहरहित मोक्ष की नाई चिरकाल तक विश्रान्ति न प्राप्त कर सकोगे । (2) वास्तविक अर्थ यह है : कामद्रेष, आदिकं के निवासस्थान कर्तृ-करण संघात के आलय देव मनुष्य आदि देह में विश्रान्तिसुख नहीं मिलता । (&) नमकीन विषयों के सेवन से विषयाभिलाषा और बढती जाती है । सुनिये ययाति ने क्या कहा है-^न जातुकामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्द्धते ॥/ (9) वास्तविक अर्थ यह है- ये काम आदि पल्लव की नाई स्नेह-राग से युक्त है, विवेक स्पन्द से सदा डरते हैँ तथा अशास्त्रीय मार्ग में खूब घूमते हैँ । (*) विवेकज्ञान होने पर वे काम आदि स्फुरित नहीं होते, तत्त्वज्ञान का अनुभव हो जाने पर ये जलने लगते हैं तथा दुराचार से कभी तनिक भी भय नहीं करते । विशुद्धता से विस्तृत, शीतल, उदार, ब्रह्मानन्दैकरसशालिनी प्रज्ञा इन लोगों में ऐसे विश्वास नहीं करती, जैसे मरुस्थल में मेघ माला