Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 23, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
वरमन्धगुहाहित्वं शिलान्तःकीटता वरम् ।
वरं मरौ पङ्गुमृगो न ग्राम्यजनसंगमः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
अन्धकारावृत गुहा में अजगर होना अच्छा है, पत्थर
के भीतर कीट होना अच्छा है तथा मरुस्थल में पंगु मृग होना अच्छा है, परन्तु ग्रामीणजन
का (70) साथ अच्छा नहीं है