Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 23, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
किं त्वया पीतममृतं किं त्वं सम्राड्विराडथ ।
सर्वार्थरिक्तोऽपि चिरं संपूर्ण इव राजसे ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्णात्मा को ही हेतुओं के वित्त द्वारा प्रकट करते है/
भगवान् क्या आपने अमृत का पान किया है या आप सम्पूर्ण लोकों के ईश्वर है अथवा विराट्
पुरुष है आप सब अर्थ से रिक्त होते हुए भी परिपूर्ण चन्द्रमा की नाई शोभते हैं