Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 23, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
शून्योऽसिपरिपूर्णोऽसि घूर्णोऽसीव स्थिरोऽसि च ।
न सर्वमपि सर्वं च न किंचित्किंचिदेव च ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
सांसारिक
दोष दुःखों से शून्य हैँ, निरतिशयानन्द होने से आप जीवन्मुकतों के गुणों से परिपूर्ण हैं, देह आदि
का कुछ भी अनुसन्धान न रहने से आप मदघूर्णित से मदोन्मत्त के समान है, आप स्थिर-से हैं,
समष्टि में अपवाद तथा अध्यारोप दृष्टि से आप सब कुछ होते हुए भी नहीं है एवं व्यष्टि मेँ अपवाद
और अध्यारोप दृष्टि से आप सब कुछ नहीं होते हुए भी सब कुछ हैं ही