Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 23, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
उपशान्तं च कान्तं च दीप्तमप्रतिघाति च ।
निवृत्तं चोर्जितं तादृग्रूपं किमिति ते मुने ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार का में हूँ. यह तुमने कैसे जाना, यदि यह कहिये, तो इसका उत्तर यह है कि आपके
रूप के अवलोकन से ही', यह सूचित करते हुए कहते हैं ।
हे मुने, शान्त, रमणीय, प्रदीप्त, प्रतिघातरहित, सर्वथा निवृत्त तथा समस्त सामर्थ्ययुक्त
जो रूप (८) रहता है वैसा यह आपका रूप क्यों भासता है ?