Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, Verse 31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 23, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

त्वदिच्छायां तु सदसद्भावं पश्यामि ते चिति । संसारमण्डलमिदं स्थितं फलमिवाङ्कुरे ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी तरह हिरण्यगर्भ के साथ आपका साट्रश्य तथा उस्रस़े बढ़कर आपमें विशेष गुण हैं, यह कहते हैं / अंकुर में काण्ड आदि फलपर्यन्त स्थित वृक्ष के रूप की नाई हे भगवान्‌, सर्वज्ञता तथा सर्वशक्तिमानता आदि गुणों से सम्पन्न आपकी आत्मा में ही यह संसारमण्डल सृष्टि योग्यरूप से स्थित मैं देखता हूं । परन्तु इस संसारमण्डल की सृष्टि के लिए सत्‌ ओर असद्भाव को मैं आपकी इच्छा में ही स्थित जानता हूँ। यदि आप चाहें तो आप भी संसार की सृष्टि अवश्य कर सकते हैं, परन्तु आप चाहते नहीं, बस यही तो आपमें हिरणयगर्भ से बढ़कर एक विशेष गुण है