Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, Verses 32–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 23, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 32,33
संस्कृत श्लोक
अहं तावदयं विप्र शाण्डिल्यकुलसंभवः ।
मङ्किर्नाम महाभाग तीर्थयात्राप्रसङ्गतः ॥ ३२ ॥
गत्वा सुदूरमध्वानं दृष्ट्वा तीर्थानि संप्रति ।
चिरकालेन सदनमात्मीयं गन्तुमुद्यतः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह प्रशसा द्वारा अभियुख किये गये महाराज वस्तिष्ठजी को अपनी वैराग्य आदि
स्राधनम्रम्पत्ति से उपदेशयोग्यता दशाने के लिए अपने योत्र, नाम आदि का बखान करता है /
हे महाभाग, मैं शाण्डिल्य गोत्र में उत्पन्न मंकि नामधारी ब्राह्मण हूँ । तीर्थयात्रा करने की
इच्छा से बहुत दूर तक जाकर मैंने अनेक तीर्थो के दर्शन किये । अनन्तर अब मैं बहुत देर से
अपने घर को जाने के लिए उद्यत हूँ