Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 23, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
पान्थ उवाच ।
अहो नु परिखेदाय प्रौढप्रायातपो रविः ।
परितापाय पापोऽयं दुर्जनेनेव संगमः ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
वह पथिक कह रहा था : अहो, जैसे दुर्जन पापी का समागम परिताप के लिए ही होता है वैसे
ही प्रचण्ड तापयुक्त यह सूर्य भी अत्यन्त खेद पहुँचाने के लिए ही उदित हुआ है