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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 24, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 24, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 24 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

सुखान्येवातिदुःखानि वरं दुःखान्यतो मुने । दृढदुःखवदन्तत्वाद्दुःखयन्ति सुखानि माम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

छदा दु-खभ्रमयुक्त ही यह सार है, यह केसे 2 क्योकि छुख भी तो ससार में अनुभूत होते हैं; इस आशंका पर कहते हैं । संसार के सभी सुख भी आखिर में अवश्य दुःखदायी होने से अत्यन्त दुःसह दुःखरूप ही है । इसलिए हे मुने, मैं सांसारिक सुखो की अपेक्षा दुःखों को ही अच्छा समझता हूँ । जलचरों से जल की शीतलता जैसे निरन्तर अभ्यास के कारण सह ली जाती है वैसे ही अविच्छिन्न दुःखपरम्परा भी सुख के अभाव के अधिक अभ्यास के कारण दुःखपूर्वक मनुष्यों से सह ली जाती है, यह भाव है