Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 24, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 24, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 24 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
तथा राम यथा दुःखमेव मे सुखतां गतम् ।
वयोदशनलोमान्त्रैः सह जर्जरतां गतम् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा अत्यन्त प्रबलदुःख का अनुबन्धी होने के कारण कदो (एक प्रकार का मोटा अन्न
खाकर जीवन धारण करने में मनुष्यों को जो दुःख है उसकी अपेक्षा विष निले हुए मिष्ठान्न भोजन
के आस्वादजनित छुखो में कम दुःख हैं / विष मिले हुए उपभोगजनित छुर्खों में द्रद्धिगान् को अधिक
दवषदद्धि रखना ही उचित है, यह कहते हैं ।
हे सौम्य, आखिर में दृढ़ दुःखदायी होने से ये सुख ही मुझे ऐसे दुःखदायी हो रहे हैं, जैसे कि
मानों मेरे लिए दुःख ही सुख हो गया हो । दाँत, केश और नाड़ियों के साथ अब मेरी अवस्था भी
जीर्ण हो गयी