Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 24, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 24, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 24 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
उच्चैःपदे पातपरा बुद्धिर्नाध्यवसायिनी ।
सुप्रवालं कुसंकल्पाद्गहनं न प्रकाशते ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
उत्तरोत्तर भोगों के उत्कर्ष स्थान में अभिलाषाएँ बाँधकर बैठी हुई मेरी बुद्धि परम
पुरुषार्थ के साधन में किसी तरह का अभी उद्योग नहीं कर रही है तथा मेरा मन भी उत्तरोत्तर बढ़
रहे रागरूपी पल्लवों से पल्लवित तथा अतीतकाल के करोड़ों बीत चुके भोगों के लिए शोक, मोह
आदि कुत्सित संकल्पं के उपस्थित रहने से विवेकज्ञानशून्य हो गया है, यही कारण है कि वह
अपने-अपने दोषादि के साक्षी के विवेक द्वारा प्रकाशित नहीं होता