Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 25, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
अहमित्येव बन्धाय नाहमित्येव मुक्तये ।
एतावन्मात्रके बन्धे स्वायत्ते किमशक्तता ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
उपयुक्त युक्तियों से जब यह सिद्ध हो बुका कि सव दृश्य चिन्मात्रस्वरूप हैं और तत्पदार्थ
चिति अयरिच्छिन्न (व्यापक) होने के कारण नित्य मुक्त है, तब त्वंपदार्थ की अहंरृप से
परिच्छिनन बुद्धि ही संसार की कारण और परिच्छिन्न बुद्धि का परित्याग गुक्ति का कारण
फलित हो जाता है, यह कहते हैं /
भद्र, "अहम् बुद्धि ही बन्धरूप संसार को पैदा करती है और अहम्बुद्धिका अभाव मुक्ति
को पैदा करता है । जब इतने बन्धन को अपने अधीन रख सकते हैं, तब भला अशक्ति ही
किस बात की ?