Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 26, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तमपि योनिशतेषु ते ।
आकल्पं भ्रमतश्चित्तशान्तिर्नास्ति शमादृते ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
अब श्रोता के चित्त को लक्ष्य कर कहते हैं
हे चित्त, ब्रह्मा से लेकर गुल्म (एक प्रकार का पौधा) तक सैकड़ों योनियों में कल्पपर्यन्त घूम
रहे तुम्हें शम को प्राप्त किये बिना शान्ति नहीं मिल सकती