Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 28, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 28, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
प्राणिवीर्यरसान्तस्था संविज्जंगममाततम् ।
तनोति लतिकान्तस्थो रसः पुष्पफलं यथा ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
यही न्याय रजवीर्य से शरीर सम्पादन में भी लगाना चाहिए. इस आशय से कहते हैं /
जैसे लता में स्थित रस पुष्प और फल का विस्तार करता है, वैसे ही यह चिति प्राणियों के
वीर्यरस में स्थित होकर इन असीम जंगम वस्तुओं का विस्तार करती है