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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

सुस्तम्भमजमालिङ्ग्य स्वात्मानमजरामरम् । तिष्ठावष्टभ्य धीरात्मा सुस्तम्भमिव मन्दिरम् ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

जिसमें चित्त भलीभाँति प्रकाशित होता है, ऐसे नित्य निरतिशयानन्दरूप, जन्मशून्य, जरा-मरणरहित, स्वात्मा का दृढ़ खम्भेवाले मन्दिर की नाई अवलम्बन कर निश्चल होकर स्थित रहिए