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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

अन्तर्मुखतया नित्यं कार्यमाहरतां बहिः । जीवतामपि नोदेति वासना दृषदामिव ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

अन्तर्मुखता से निरन्तर बाहर के कार्यो का सम्पादन कर रहे भी प्राणियों मे वासना ऐसे उत्पन्न नहीं होती, जैसे कि पत्थरों मे नहीं होती