Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
पुनः प्रसरणोन्मुक्तमन्तःसुप्तं मनः कुरु ।
कुर्वन्सर्वाणि कर्माणि कृर्माङ्गवदवृत्तिमान् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, कछुए के अंगों के सदृश भीतर और बाहर के सब वृत्तियों से विरत होकर सारे
कर्म करते हुए भी आप अपने मन को भीतर लीन कर दीजिए ताकि फिर वह बाहर न निकलने
पावे