Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
वृत्तित्यागविलीनेन किंचित्प्रसरता बहिः ।
अन्तरत्यन्तसुप्तेन चेतसा तिष्ठ विज्वरः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, आप समस्त चिन्ताओं को
तिलांजलि देकर ऐसे चित्त से युक्त रहिए, जो कि निर्विकल्प समाधि के अभ्यास से बाधित हो चुका
हो, कुछ कुछ बाहर की ओर प्रतिभासरूप से निकल सकता हो तथा भीतर से मर गया हो