Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
अहं तावदयं तात चिदाकाशो निरामयः ।
चेत्यसंवेद्यरहितः सर्वसंकल्पनातिगः ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे तात, जो “अहम्” यह वस्तु है, वह यह निरामय
(विकारशून्य चैतन्याकाश) ही है । वह बाह्य एवं आभ्यन्तर विषयों से रहित है ओर समस्त
कल्पनाओं से परे हैं