Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 60
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 60 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 60
संस्कृत श्लोक
संविन्मात्रस्य शुद्धस्य शून्यस्य च किमन्तरम् ।
यच्चान्तरं तद्विबुधा विदन्त्येति न वाग्गतिम् ॥ ६० ॥
हिन्दी अर्थ
समस्त दृश्यों का विनाश हो जाने पर अन्त में बच जानेवाला संविन्मात्रस्वकृप जो आत्मा ङ
वह थुन्यरूप नहीं है, किन्तु निरातिशयानन्दरूप ही है, यह विद्वानों का अनुभव है, यह कहते हैं /
अन्त में अवशिष्ट विशुद्ध संविन्मात्रस्वरूप आत्मा में और शून्य में क्या अन्तर है, यह हम लोग
नहीं जान सकते । जो अन्तर है, उसे तो विद्वान् कहते हैं कि वह वाणी का विषय नहीं है,
स्वानुभववेद्य है अर्थात् निरतिशयानन्दरूप है, उसका वर्णन कैसा कर सकते हैं ?