Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 61
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 61 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 61
संस्कृत श्लोक
सदसद्रूप आभासो यथा किमपि लक्ष्यते ।
तमसीक्षितयत्नेन ब्रह्मणीदं तथा जगत् ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
तब विवेकियों की योक्तिक इष्टि से जगत् कैसा हैं / इसे कहते हैं ।
जैसे आँख के प्रणिधानरूप (एकाग्रता) प्रयत्न से अन्धकार में कुछ सद्-असद्रूप आभास
दिखाई देता है, वैसे ही ब्रह्म में जो आभास दिखाई देता है वह आभास ही यह जगत् है