Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 32, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 32, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
क्षीयते तत्त्ववित्सङ्गादहमित्येव बन्धनम् ।
आलोकेनेव तिमिरं दिवसेनेव यामिनी ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे प्रकाश से अन्धकार नष्ट हो जाता है, जैसे दिवस से रात्रि नष्ट हो जाती
है, वैसे ही तत्त्वज्ञानी के सत्संग से अहम्भावरूपी बन्धन तत्काल ही नष्ट हो जाता है