Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 33, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
वातस्पन्दाविवाभिन्नौ ब्रह्मसर्गौ विभिन्नता ।
तयोस्त्वसत्या स्वभ्रान्तौ स्वप्ने स्वमरणोपमा ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, जैसे वायु और वायु के स्पन्दन में कोई भिन्नता विद्यमान नहीं है, वैसे ही ब्रह्म और ब्रह्म की
सृष्टि में भी कोई भिन्नता नहीं है । अपने स्वरूप की भ्रान्ति हो जाने पर ही उनमें विभिन्नता
भासती है, पर वह स्वप्न मेँ स्वमरण के सदुश असत्यरूप है