Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 34, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
तथैकब्रह्मचिद्रूपे पवनस्पन्दने यथा ।
अत्राचिद्बोधता सर्गो मोक्षो ब्रह्मैकबोधता ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे अज्ञान से पवन और स्पन्दन में भेदप्रतीति होती
है वैसे ही अद्वितीय ब्रह्मचैतन्य में अज्ञान से भेद प्रतीत होता हे । इससे निष्कर्ष यह निकला
कि चिति ओर अचिति का भेददर्शन ही सृष्टि है तथा ब्रह्मैक्यदर्शन मोक्ष है