Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 34, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
चित्स्पन्दो ब्रह्ममरुतो यत्र सर्ग इति स्मृतः ।
नात्र चित्स्पन्दनं यत्स्यान्निर्वाणं तदुदाहृतम् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
जहाँ
ब्रह्मरूप वायु से चिति का स्पन्दन होता है वहीं पर सर्ग नाम पड़ जाता है अतः यहाँ जब चिति
का स्पन्दन नहीं होगा, तभी वह निर्वाण कहा जायेगा