Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 34, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
पत्रादिवेदनाद्बीजं यथा पत्रादि तिष्ठति ।
परा चित्सर्गसंवित्तिस्तथा भवति सर्गता ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञानकाल में ही ब्रह्मभावनिष्ठा हो जाती हैं, इसमें भी ये ही दृष्टान्त हैं; यह कहते है /
जैसे पत्र आदि के ज्ञान से बीज पत्र आदिरूप से स्थित हो जाता है, वैसे ही परमचैतन्यरूप
ब्रह्म सृष्टिज्ञान से सृष्टिरूप हो जाता है