Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 34, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
निजसंकल्पमात्रात्मा निजसंकल्पनात्क्षयी ।
द्वैताद्वैतविकारोऽयं संकल्पनगरं यथा ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
संकल्पनगर के सदृश यह द्वैत-
अद्वैतात्मक जगत् केवल अपना संकल्परूप ही है, अतः अपना संकल्प जब नष्ट हो जाता है, तब
यह भी नष्ट हो जाता है