Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 35, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
एतस्मिन्विकसन्तीमा विपुलाकाशकानने ।
जगज्जरठमञ्जर्यः प्रसरत्पत्रपञ्चकाः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस
विस्तृत आकाशरूपी जंगल में प्रसार को प्राप्त हो रहे पंचभूतरूप पत्तों के सहित ये जगद्रूप पुरानी
मंजरियाँ विकसित हो रही हैं