Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 35, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
व्योमवृक्षफलस्यास्य स्वेच्छावयव उज्ज्वला ।
सर्गोपलम्भ उद्यच्च चमत्कुर्वन्ति संविदि ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
अपरिच्छिन्न ब्रह्मसंवित् में आकाशरूपी गूलर के वृक्ष के फल के सदुश इस ब्रह्माण्ड
के अपनी इच्छा से कल्पित तीनों लोक के अवयव में देदीप्यमान सूर्य -चन्द्र आदि अपने से उदित
हो रहे चक्षु आदि इन्द्रिय तथा किरणजाल को जीवभूत आत्मा के रूपादिदर्शन मेँ उपकरण बनकर
चमत्कृत करते हैं