Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 35, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
अन्तस्थेन बहिष्ठेन नानानानातयात्मनि ।
एष सोऽन्तर्बहिर्भाति भावाभावविभावया ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
वह परमात्मा ही भीतर स्थित वासनामय प्रपंच से बाहर स्थित जगत्स्वरूप
से, जाग्रत्-स्वप्न में नानारूप से ओर सुषुप्ति में एकरूप से भाव और अभाव की यानी आविर्भाव
ओर तिरोभाव की भावना करके स्वयं अपनी आत्मा मेँ ही बाहर और भीतर भासता हे, इससे भिन्न
अणुमात्र भी दूसरा कुछ नहीं भासता