Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
तत्किमात्मनि बन्धाय विदग्धं न मुधाधमाः ।
स्पष्ट एवोपचयादेर्वस्तुन्यस्तमिताऽपदे ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
अब परम कारुणिक भगवान् कर्तिष्ठकी दृश्य कोंदुक मे आसक्त अधम अधिकारियों की, जो
श्रोता हैं; बलात् भर्त्सना कर उनकी द्रश्यासक्ति का त्याग कराने की इच्छा से कहते हैं /
हे अधम प्राणियों, सम्पूर्ण विकारों की अनाश्रयरूप परमार्थ वस्तु के स्वप्रकाशस्वरूप होने के
कारण शास्त्रों एवं आचार्यो के उपदेश से हाथ में स्थित आमलक के समान स्पष्ट स्फुरित रहते
उसका अदर्शन क्यों पाते हो, दर्शन क्यों नहीं करते ? क्या अपनी आत्मा को बन्धन में डालने के
लिए ही उस दृश्यसमूह को भस्मीभूत नहीं करते ?