Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
दुःखं सुखं भावनया कुर्वन्विषमिवामृतम् ।
इति निश्चित्य धीरात्मा प्रबुद्ध इति कथ्यते ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, पूर्ववर्णित आत्मतत्त्व का निश्चय कर दुःख को
निरतिशयानन्दरूप आत्मा की भावना से, विष को अमृत की नाई, सुखस्वरूप बना रहा धीरात्मा
योगी ही प्रबुद्ध कहा जाता है