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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 41

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

तत्स्थितं व्योमनि व्योम शान्ते शान्तं शिवे शिवम् । शून्ये शून्यं सति च सद्यद्ब्रह्मणि जगत्स्थितम् ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

तत्वबोध के अनुसार जो स्थिति हें कही समस्त वस्तुओं की अश्रान्त स्थिति है, ऐसी स्थिति अन्नानियों में प्रसिद्ध नहीं हैं; यह कहते है/ जब ब्रह्म मेँ जगत्‌ स्थित हो जाता है, तब आकाश में आकाश, शान्त में शान्त, शिव में शिव, शून्य में शून्य, और सत्‌ में सत्‌ स्थित हो जाता है, विपरीत रूप से कोई पदार्थ किसी में स्थित नहीं रहता