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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verses 63–64

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verses 63–64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 63

संस्कृत श्लोक

नेह संजायते किंचिज्जगदादि न नश्यति । स्वप्नो निद्रागतस्येव केवलं प्रतिभासते ॥ ६३ ॥ अविद्यमाने पृथ्व्यादौ प्रतिभामात्ररूपिणि । सर्गे क इव संरम्भस्त्यागादानैश्चिदम्बरे ॥ ६४ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वप्नादिक पदार्थों की नाई प्रतिभास से अतिरिक्त ग्रातिभाम्रिक पदार्थों की उत्पत्ति आदि कहीं भी प्रसिद्ध नहीं हैं, यह कहते हैं / इस परमात्मा में वस्तुतः जगत्‌ आदि कुछ भी न तो उत्पन्न होता है और न नष्ट ही होता है। किन्तु केवल निद्राग्रस्त प्राणी के स्वप्न के सदृश भासता है