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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 66

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 66 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 66

संस्कृत श्लोक

बुद्ध्यादेः कारणत्वं च द्वैतैक्यासंभवान्न सत् । अनेनेदं क्रियत इत्यस्यार्थं याति संभवात् ॥ ६६ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार बुद्धि आदि में अपने प्रतिभासक चैतन्यात्मा की अपेक्षा से भेद और अभेद का संभव न होने के कारण “इससे यह किया जाता है" इस तरह के व्यवहार की असत्‌ भी कारणता आखिर में परमार्थ वस्तु को ही प्राप्त करती है, क्योकि एकमात्र उसीका संभव है