Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 67
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 67
संस्कृत श्लोक
अहेतुरक्रमं भाति चिति कल्पक्रियागणः ।
क्षणेनैव यथा स्वप्ने मृतिजन्मादि सत्वराः ॥ ६७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस चिति में कल्प, महाकल्प एवं उनमें होनेवाली सब क्रियाएँ
अहेतुक तथा अक्रमिक हैं और वे ऐसे भासित होते हैं, जैसे स्वप्न में क्षणभर में ही अहेतुक तथा
अक्रमिक जन्म-मरण आदि शीघ्र भासित होते हैं