Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 68
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 68 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 68
संस्कृत श्लोक
खमेव पृथ्वी खं शैलाः खमेव दृढभित्तयः ।
खमेव लोकाः स्पन्दः खं सर्गसंवेदनं चितेः ॥ ६८ ॥
हिन्दी अर्थ
इसका फलितार्थ यह हुआ कि सव चिदाकाश ही है, यह कहते हैं ।
चूँकि चिति को सृष्टि का संवेदन अपनी ही आत्मा में होता है और दूसरी जगह नहीं, इसलिए
यह सारी पृथिवी चिदाकाशस्वरूप ही है, ये पर्वत सब चिदाकाशरूप हैं, ये अत्यन्त दृढ़ दीवारें और
ये सब लोक चिदाकाशरूप ही हैं एवं स्पन्द भी चिदाकाश ही है