Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 38, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
पार्श्वस्थस्वप्नमेघौघा यथा तव न काश्चन ।
सर्गप्रलयसंरम्भास्तथा खात्मान एव मे ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
सत् ब्रह्म का सर्यरुप विवर्तो से अलोप नहीं होता, यह बतलाते हैं।
समीपस्थ पुरुष के स्वप्न के मेघ जैसे आपके कुछ नहीं हैं यानी उनसे आपका कुछ लोप
नहीं होता, वैसे ही चिदाकाशरूप मेरे सृष्टि, प्रलय आदि महाआरम्भ कुछ भी नहीं हैं, यानी
आत्मा में कुछ भी उनसे नहीं होता