Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 4, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
अहमर्थमलोन्मुक्तमव्यक्तं ताम्रमङ्ग चेत् ।
तत्परं परमाभासं संपन्नं हेम कान्तिमत् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी,
जो विशुद्ध सुवर्णरूप चिरकालिक चैतन्य है, वह अहंकाररूप मल के सम्पर्कं से जीवरूपी ताम्रभाव
को प्राप्त हुआ है, परन्तु श्रवणादि उपायरूपी अग्नि में तपकर जब अहंकाररूपी मल से निर्मुक्त हो
जाता है तब वही परमप्रकाशमय कान्तिमान् ब्रह्मरूपी सुवर्णं (५) बन जाता है