Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 4, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
यथा निरभिधार्थश्रीर्भजत्यव्यपदेश्यताम् ।
तथानहन्ताहन्तेयं ब्रह्मत्वमधिगच्छति ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि आप यह के कि अहंकार की निवृत्ति हो जाने फर किस नाम से मेरा उपदेश होगा, तो इस
पर मेरा कहना यह हैं कि समुद्र मे विलीन सैन्धव आदि पदार्थों की तरह तत्-तत् नाम की ।निवृत्ति
से जैसी अव्यपदेश्यता होती हैं वैसी ही आपकी भी अव्यपदेश्यता होगी। उस समय आप अनिर्वचनीय
ब्रह्मस्वरूप हो जाओगे, यह कहते हैं /
जैसे समुद्र में विलीन हुए पदार्थों का स्वरूप अव्यपदेश्यता को प्राप्त हो जाता है वैसे ही
अनहन्ता से ब्रह्म में विलीन हुई अहन्ता भी अव्यपदेश्यता को प्राप्त हो जाती है, क्योंकि उस समय
वह ब्रह्मरूप बन जाती है