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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 35

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 4, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

अस्त्यहन्त्वे स्थितं ब्रह्म सनामेव पदार्थवत् । शान्तवत्सदिवाभासं तद्वत्स व्यपदेशवान् ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

अहंकार निवृत्ति के बाद ब्रह्म आदि नाम से जो जीव का व्यवहार होता है वह भी अन्य पद के अर्थ की नाई उसमे (जीवमें) अहंकाररूप अल्पत्व (छोटेपन का) नाशरूप जो कृहत्व (बड़प्पन / है, तत्स्वरुपप्रवृत्तिनिमित्त की कल्पना करके ही होता हैं, वस्चुतः नहीं होता, यह कहते हैं । तरंग आदि धर्मों से शून्य अपने स्वाभाविक स्वरूप से स्थित हुआ जल जैसे पूर्व के तरंग आदि रूप से भीतर सत्य-सा प्रतीत होकर तरंग आदि नामों से व्यवहृत होता है और (&) देखिये यह श्रुति : “परं ज्योतिरूपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ।* स्वाभाविक जलरूप से स्थित हुआ तरंग आदि नामों से व्यवहृत नहीं होता, वैसे ही अपने स्वरूप में स्थित आत्मा किसी नाम से व्यवहृत नहीं होता, परन्तु जब अहन्ता रहती है, तब वह अन्य पदार्थो के सदृश नामवाला सा बनकर स्थित रहता है ओर उन-उन लाक्षणिक नामों की कल्पना से व्यवहृत होता है