Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
किमेतास्वतिशून्यासु संसारारण्यभूमिषु ।
मानवा वातहरिणा भ्रमथो भ्रान्तबुद्धयः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मनुष्यों,
आप सबके सब बिलकुल शून्य इस संसाररूपी महाजंगल की मरुभूमिया में भ्रान्तचित्त मृगों की नाई
क्यों भटकते-फिरते हैं ?