Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 44, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
मृदुभिः सत्क्रियाकुन्तैर्विवेकार्कातपैरपि ।
अचिन्त्यालोकदैरस्मान्मार्जितव्यं रजस्तमः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
अहिसाप्रधान होने से अत्यंत कोमल, यम, नियम, प्राणायाम, ईश्वरोपासनादि सतक्रियारूपी
झाड़ओं से इस अंकुर के खेत से रज को (रजोगुण को) दूर फेंक देना चाहिये तथा इसी तरह
अचिन्त्य ब्रह्मलोकपद विवेकरूपी धूप से अज्ञानरूपी अन्धकार को भी दूर भगा देना चाहिये