Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 44, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
संपदः प्रमदाश्चैव तरङ्गा भोगभङ्गुराः ।
पतन्त्यशनयस्तस्मिन्दुष्कृताभ्रसमीरिताः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
भोगों द्वारा क्षणभंगुर तथा तरंगों के समान चंचल, दुष्कृतरूपी मेघों से प्राप्त सम्पत्ति ओर प्रमदारूपी
अनेक वज्र इस अंकुर के ऊपर गिरते हैं