Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 44, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
धैर्यौदार्यदयामन्त्रैर्जपस्नानतपोदमैः ।
विनिवारयितव्यास्ताः प्रणवार्थत्रिशूलिना ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए धैर्य, औदार्य तथा दया आदि यत्नो से एवं
जप, स्नान, तप और दम आदि के द्वारा प्रणव के अर्थरूप त्रिशूल को धारण करके उन वज़पातों
का निवारण करना चाहिए