Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 44, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
तेन सा चित्तभूर्भाति सप्रकाशा विकासिनी ।
भवत्यालोकरम्या च खं यथाभिनवेन्दुना ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे अभिनव चन्दमा से आकाश सुन्दर प्रतीत होता है वैसे ही उस विवेक नामक नवीन
अंकुर से आत्मप्रकाशयुक्त विकासशालिनी चित्तभूमि आलोक रहने से सुन्दर प्रतीत होती है