Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 44, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
तस्मादङ्कुरतः पत्रे उभौ विकसतः स्वयम् ।
एकं शास्त्राभिगमनं द्वितीयं साधुसंगमः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, उस अंकुर से दो पत्ते अपने-आप निकलते हँ । जिनमें एक का नाम तो वेदान्तशास्त्र
का विचार ओर दूसरे का नाम साधुपुरुषों का समागम है